अति की मति
आईये आज आपको अपने एक मित्र से मिलवायें। वैसे तो वह हमारे साथ काम करते है, लेकिन फिर भी हम उन्हें अपना मित्र कह सकते है। यह बात अलग है कि उनके अनुसार यह हमारा सौभाग्य है कि वह हमारे मित्र है। हमारे इन मित्र का नाम है ‘अति’। अरे ना, ना, ना!!! इनके नाम को देखकर इस धोखे मे मत पढना कि यह कोई नौंटकी छाप आदमी है। अपने नाम के अनुरुप इनकी बुद्धि (मति) भी विशाल है ऐसा इनका मानना है। अपने आपको बुद्धिजिवी कहलाने मे इन्हें विशेष गर्व होता है। तभी तो हम जैसे अल्प-मति प्राणियों का यह सौभाग्य है कि वह हमारे मित्र है।
अब हमारे इन बुद्धिजिवी मित्र की विशेषता है कि जब तक किसी महत्वपूर्ण घटना पर यह अपना पक्ष न रख दें तब तक इन्हें चैन नही आता। अब उ. कोरिया परमाणु विस्फोट करे और हमारे अति जी की ‘मति’ इस विषय पर न चलें ऐसा संभव नही। तो हो गये शुरू कल लचं में अपनी विशेष दिव्य-दृष्टि के साथ।
अब अति जी की मानें तो उ. कोरिया के परमाणु विस्फोटों पर अमेरिका का हो-हल्ला एक तमाशा है। उनके अनुसार इन विस्फोटों के पिछे अमेरिका का ही हाथ है, ऐसा उन्हें अपने विशेष सुत्रों से पता चला है। वो यों कि इन विस्फोटों के द्वारा वह विश्व जनमत को परमाणु हथियारों का भय दिखाकर ईरान पर हमला करने की अपनी योजना को अमली जामा पहनाना चहाता है। वैसे भी इराक में उसकी जो किरकिरी हुई है उसके बाद ईरान पर हमला करने के लिए उसे किसी ठोस वजह की आवश्यकता थी।
इस पर हमने पुछा कि फिर तो अमेरिका को उ. कोरिया पर भी हमला करना चाहिए, क्योकिं ईरान पर तो परमाणु हथियार बनाने का संदेह है जबकि उ. कोरिया ने तो छाती ठोंककर ऐलान कर दिया है कि वह एक परमाणु शक्ति है।
पहले तो उन्होने हमें घूरकर देखा, फिर हेय-दृष्टि के साथ ठसककर बोले, “भईये जब अक्ल कम हो तो ऐसी बड़ी चिजों पर उसे इस्तेमाल नही करना चाहिये। यह काम तो हम जैसे बुद्धिजिवियों का है।”
इतना सुनकर हम सहम गये तो उन्होनें आगे कहना शुरू किया, “भई अमेरिका उ. कोरिया पर हमला क्यों करेगा। उसे वहाँ से कौन सा तेल मिलना है? जहाँ से तेल मिलना है उस जमीन पर तो उसका अधिकार हो ही चुका है। साउदी अरब को तो उसने पहले ही डालर की चका-चौंध से अंधा किया हुआ है। इराक और अफगानिस्तान उसके कदमों में गिर ही चुके है। रूस में इतना दम बचा नही कि वह मध्य एशिया में दखल दे सके। तो जो एकमात्र रोड़ा बचा वह है ईरान। और उसे ठिकाने लगाने कि तैयारियों का बिगुल बज चुका है।”
वैसे तो अति जी किसी भी विषय पर धारा-प्रवाह कई घटों तक अपने विचार प्रकट कर सकते है। लेकिन जब बहुत देर तक वापस अपनी सीट पर नही पहुचें तो अति जी के लिए बौस का बुलावा आ गया और उन्हें अपनी मति को विश्राम देना पड़ा और हमने भी राहत की साँस ली।
October 18, 2006 at 5:30 am
ऐसे लोग हर जगह पाए जाते हैं और मेरे भी कुछ मित्र इसी किस्म के हैं
कभी कभी तो दिमाग की मां बेहन कर देते हैं 
October 26, 2006 at 8:14 pm
॥जहाँ न पहुँचे रबि, बहाँ पहुँच कवि॥
November 1, 2006 at 7:02 am
आपकी हिन्दी यात्रा कमाल की है. मात्र कुछ समय पहले ही आपने हिन्दी लिखना सीखा और अब आप सरपट घोड़े दौड़ा रहे हैं - प्रशंसनीय!
आपके लेखन में नियमितता बनी रहे यह कामना है.