तारे जमीन पर
देखो इन्हे ये ओस की बुंदे
पत्तो की गोद में आसमां से कुदे
अगंडाई ले फिर करवट बदल कर
नाजुक से मोती ह्सँ दे फिसलकर
खो न जाये ये तारे जमीन पर।
ये शब्द है आमिर खान की आने वाली नई फिल्म ‘तारे जमीन पर’ के शीर्षक गीत के। लेकिन इन शब्दों में मात्र गेयता ही नही है अपितु कविता की कल्पना भी है। गीत के प्रोमो को देखकर ही पता चलता है कि गीतकार ने छोटे बच्चों की ओस की बुदों के रुप में कल्पना की है। ओस की बुदों का मानवीकरण करके गीतकार ने केवल कुछ शब्दों मे ही बच्चों की चचंलता, निश्छलता और नाजुकता का वर्णन कर दिया है। इस गीत के लेखक है ‘प्रसुन जोशी’।
इस तरह के गीत आजकल हिन्दी फिल्मों मे कम ही सुनने को मिलते है। वैसे तो पिछले कुछ वर्षो मे हिन्दी फिल्मों में बहुत से सुंदर गीत सुनने को मिले है लेकिन फिर भी इतने भावप्रण गीतों की संख्या कम ही है। “रग दे बसंती” में भी प्रसुन के ही लिखे गीत थे जो कि काफी अच्छे लगे थे। प्रसुन के अलावा एक और गीतकार है ‘स्वानंद किरकिरे’ जिनके गीत भी काफी भावुक तथा काव्यात्मक होते है। परिणिता फिल्म के गीत इसका उदहारण है।
टीवी पर ‘तारे जमीन पर’ के प्रोमो मे गीत का केवल कुछ हिस्सा ही सुनने को मिलता है। पुरे गीत का बेसब्री से इतंजार है। और फिल्म का भी। आखिर आमिर खान मेरे फेवरेट कलाकारों में से एक है।
November 1, 2007 at 3:37 pm
गीत का एक भाग सुनवाकर पूरे गीत को सुनने की उत्सुकता जगवा दी. अब इन्तजार लगवा दिया है, तो इन्तेजाम भी आप ही करियेगा पूरा सुनवाने का जब आ जाये.
November 1, 2007 at 4:25 pm
बढिया जानकारी दी है अब गीत का इंतजार है।
November 1, 2007 at 4:47 pm
इस गीत पर मेरी कुछ दिनों से नज़र है। प्रसून जोशी से मुझे ऍसी ही उम्मीद थी। आपने जोशी जी द्वारा लिखे ‘फिर मिलेंगे ‘ के गीतों को सुना है। वैसे काव्यत्मक गीत आजकल बहुत कम लिखे जाते हैं।
स्वानंद किरकिरे मेरे भी बेहद प्रिय गीतकार हैं। परिणिता में लिखे उनके गीत मेरी countdown में अव्वल रहे थे। इस साल लागा चुनरी में दाग में उनका मस्ती भरा हम तो ऍसे हैं भईया अच्छा बन पड़ा है।