तारे जमीन पर

November 1, 2007

देखो इन्हे ये ओस की बुंदे

पत्तो की गोद में आसमां से कुदे

अगंडाई ले फिर करवट बदल कर

नाजुक से मोती ह्सँ दे फिसलकर

खो न जाये ये तारे जमीन पर।

ये शब्द है आमिर खान की आने वाली नई फिल्म ‘तारे जमीन पर’ के शीर्षक गीत के। लेकिन इन शब्दों में मात्र गेयता ही नही है अपितु कविता की कल्पना भी है। गीत के प्रोमो को देखकर ही पता चलता है कि गीतकार ने छोटे बच्चों की ओस की बुदों के रुप में कल्पना की है। ओस की बुदों का मानवीकरण करके गीतकार ने केवल कुछ शब्दों मे ही बच्चों की चचंलता, निश्छलता और नाजुकता का वर्णन कर दिया है। इस गीत के लेखक है ‘प्रसुन जोशी’।

इस तरह के गीत आजकल हिन्दी फिल्मों मे कम ही सुनने को मिलते है। वैसे तो पिछले कुछ वर्षो मे हिन्दी फिल्मों में बहुत से सुंदर गीत सुनने को मिले है लेकिन फिर भी इतने भावप्रण गीतों की संख्या कम ही है। “रग दे बसंती” में भी प्रसुन के ही लिखे गीत थे जो कि काफी अच्छे लगे थे। प्रसुन के अलावा एक और गीतकार है ‘स्वानंद किरकिरे’ जिनके गीत भी काफी भावुक तथा काव्यात्मक होते है। परिणिता फिल्म के गीत इसका उदहारण है।

टीवी पर ‘तारे जमीन पर’ के प्रोमो मे गीत का केवल कुछ हिस्सा ही सुनने को मिलता है। पुरे गीत का बेसब्री से इतंजार है। और फिल्म का भी। आखिर आमिर खान मेरे फेवरेट कलाकारों में से एक है।


रियेलिटी शो और जनता

October 6, 2007

सोनी का इंडियन आईडिल खत्म हो चुका है, जी टीवी का “सा रे गा मा” भी अपने अंतिम पड़ाव पर है और हमे लगा था की शायद स्टार का “वी ओ आई” भी अब कुछ हफ़्तो में अपना लगंर उठा लेगा। लेकिन नही जनाब, इस हफ़्ते निर्देशक ने ऐसी छ्ड़ी घुमाई की अब इस प्रोग्राम को तीन महीने तो आराम से खींचा जा सकता है। “वाइल्ड कार्ड एट्रीं” से तीन प्रतियोगियों को दुबारा चांस दिया जा रहा है, और यह सब हो रहा है जनता की माँग पर। लेकिन जरा इन लोगों से पुछो कि यदि यह जनता की माँग थी तो जनता ने इन्हें पहले निकाला ही क्यों।

कल एक मजेदार वाक्या और देखने को मिला, आदरणीय जजों ने अपने वीटो पावर के द्वारा दो कि बजाए तीन उम्मीदवारों को “वाइल्ड कार्ड एट्रीं दिलवाई। वजह? क्योंकि तीसरी प्रतिभागी भी काफी अच्छा गाती है और उसका बाहर होना उसके टैलेंट के साथ नाइंसाफी होता। लेकिन जब वही प्रतिभागी पहले बाहार हो रही थी तभी इन जजों ने अपने वीटो पावर का इस्तेमाल क्यों नही किया? और अगर जनता नें इन्हें फिर से बाहर कर दिया तब क्या होगा? क्योंकि जनता तो सब मेरी तरह है संगीत का “क ख ग” भी नही जानती। जिसका गाना जिस दिन दिल को भा गया बस उसे ही वोट दे दिया। बाकी दुसरे ज्यादा योग्य उम्मीदवार की सारी मेहनत, सारा रियाज जायें भाड़ में। पता नही यह जज वहाँ बैठकर, संगीत की जानकारी रखते हुये भी ऐसा क्यों होने देते है। चाहे वह इंडियन आईडिल हो, सा रे गा मा हो या फिर स्टार वी ओ आई हो सब जगह एक ही कहानी है.

और यह सब होने दिया जाता है सिर्फ sms से होने वाली कमाई के लिये। जजों को अपनी नौटकी का पैसा मिल जाता है, चैनल को अपना हिस्सा और निर्देशक को अपना। बाकी सगींत की सेवा वह तो केवल दिखावा है जनता से sms मांगने का। इस हफ्ते इंडिया टुडे में छपी रपट के अनुसार इंडियल आईडिल को अब तक 7 करोड़ तथा सा रे गा मा को 5.5 करोड़ sms मिल चुके है। यदि 3 रूपये की एवरेज कोस्ट भी लगाई जाए तो 15 से 20 करोड़ की आमदनी तो केवल sms के द्वारा ही। जब लोगों को बेवकूफ बना कर भी इतनी कमाई की जा सकती है तो संगीत की गहराई में डूबने की क्या आवश्यकता है। जीतने के बाद चाहे इन विजेताओं को कोई भी न पुछे, इससे इन लोगों को क्या। यह लोग तो अगले साल फिर से नए चेहेरों को लेकर जनता को बेवकूफ बनाने आ जायेगें


विंडोज का लाइव राईटर

October 4, 2007

अभी कुछ देर पहले ही श्रीश जी के ब्लाग पर इस टूल के बारे में पढा था। पढते ही डाउनलोड कर लिया और ट्राई भी कर लिया। चलो इस बहाने से ही काफी दिनों के बाद कुछ पोस्ट तो किया, नही तो हम अपने ही चिट्ठे को भुलते जा रहे थे।


भारती की गवाही

November 29, 2006

भारती यादव को आखिरकार आना ही पड़ा। वैसे भारती के परिवार ने कोशिश तो काफी की उसको गवाही से बचाने के लिए। लेकिन हाय रे किस्मत, पासपोर्ट ने सब गड़बड़ कर दी। चलो देर से ही सही अब भारती की गवाही हो सकेगी। लेकिन देखना होगा कि भारती कोर्ट मे कया बयान देती है। क्या भारती अपने परिवार के खिलाफ जा सकेगी? वैसे अगर वह ऐसा पिछ्ले कई सालों मे नही कर पाई तो संदेह होता है कि वह आज भी ऐसा कर पायेगी। लेकिन यदि भारती ऐसा कर पाती है तो सच की यह एक और जीत होगी।

पिछले कुछ समय से मीड़िया में चर्चित कई केसों के फैसले आए है और काफी त्वरित आये है। चाहे वह प्रियदर्शनी मट्टू केस हो या फिर जेसिका लाल केस की पुनः सुनवाई हो। और ऐसा हो पाया है केवल मीड़िया की सजगता के कारण। मीड़िया ने जिस प्रकार इन केसों पर नजर रखी तथा जनता को इन मुद्दों से जोड़े रखा वह सचमुच काबिले तारिफ है। वैसे और भी आच्छा हो यदि यही मीड़िया रोज दो-तीन घंटे क्रिकेट पर बर्बाद करने की बजाए, जनता को इसी प्रकार सामाजिक मुद्दों पर जागरुक करें तथा उन्हें उनसे जुड़ने मे मदद करें।


यह कैसी सरकार!

November 7, 2006

लो महिने भर की टाल-मटोल के बाद वह स्थिति ही गई जिसका की सभी को अंदेशा था। सुप्रिम कोर्ट ने साफ कर दिया कि दिल्ली में सिलिंग नही रूकेगी। पिछले महीने व्यापारियों के सड़को पर उतरने तथा सीलमपुर में दो लोगों की मौत के बाद लोगों को लगा था कि शायद अब सरकार हरकत में आयेगी और इस समस्या का कोई समाधान लायेगी। लेकिन बार-बार कोर्ट से मोहलत लेने के बावजूद इस सरकार ने कोई ठोस कार्य नही किया। और कल सुप्रिम कोर्ट से कड़ी फटकार के बावजूद भी नही लगता कि इन नेताओं की चमड़ी पर कोई फर्क पढ़ेगा।

अब सुप्रिम कोर्ट की फटकार के बाद इस सरकार का कहना है कि वह इस मामलें में ज्यादा कुछ नही कर सकती और कोर्ट के आदेश का पालन करना उसकी संवैधानिक मजबूरी है। लेकिन अफजल की फाँसी की सज़ा और सांसदों के लाभ के पद के मामले में इस सरकार का विवेक कहाँ था? आखिर वह भी तो सुप्रिम कोर्ट के ही निर्णय थे! उस समय इस सरकार की कोर्ट के निर्णय को मानने की बाध्यता नही थी क्या?

कोर्ट के निर्णय के बाद आज फिर व्यापारी सड़कों पर होगें। उन्हे उम्मीद है कि उनके आदोंलन तथा उग्र प्रदर्शन के बाद सरकार को होश आयेगा। वह 40 लाख लोगों की रोजी-रोटी की चिन्ता के प्रति सचेत होगी और समस्या के हल के लिए कोई पहल करेगी। लेकिन इसकी उम्मीद कम ही है। कल आजतक पर दिखाई एक रपट के अनुसार दिल्ली के नये बने मालों में पैसा ज्यादातर बड़े बिल्ड़रों और नेताऔं का ही लगा हुआ है, ऐसे में उनसे उम्मीद करना कि वे अपना नुकसान करेगें निरि बेवकूफी है। इसके अतिरिक्त अब रिटेल के कारोंबार में रिलांयस, टाटा, भारती और ITC जैसे बड़े मगरमच्छों के उतरने के पश्चात यह सोचना कि यह सरकार छोटी मच्छलियों की रक्षा करेगी अपने को धोखे में रखना है। वैसे भी इन नेताऔं को तो अपना हिस्सा मिल ही चुका होगा। बाकी जायें भाड़ मे उनकी बला से!पूंजिवाद की जय हो। डालर देवता की जय हो।

 


अति की मति

October 14, 2006

आईये आज पको अपने एक मित्र से मिलवायें। वैसे तो वह हमारे साथ काम करते है, लेकिन फिर भी हम उन्हें अपना मित्र कह सकते है। यह बात अलग है कि उनके अनुसार यह हमारा सौभाग्य है कि वह हमारे मित्र है। हमारे इन मित्र का नाम है अति। अरे ना, ना, ना!!! इनके नाम को देखकर इस धोखे मे मत पढना कि यह कोई नौंटकी छाप आदमी है। अपने नाम के अनुरुप इनकी बुद्धि (मति) भी विशाल है ऐसा इनका मानना है। अपने आपको बुद्धिजिवी कहलाने मे इन्हें विशेष गर्व होता है। तभी तो हम जैसे अल्प-मति प्राणियों का यह सौभाग्य है कि वह हमारे मित्र है।

अब हमारे इन बुद्धिजिवी मित्र की विशेषता है कि जब तक किसी महत्वपूर्ण घटना पर यह अपना पक्ष न रख दें तब तक इन्हें चैन नही आता। अब उ. कोरिया परमाणु विस्फोट करे और हमारे अति जी की मति इस विषय पर न चलें ऐसा संभव नही। तो हो गये शुरू कल लचं में अपनी विशेष दिव्य-दृष्टि के साथ।

अब अति जी की मानें तो . कोरिया के परमाणु विस्फोटों पर अमेरिका का हो-हल्ला एक तमाशा है। उनके अनुसार इन विस्फोटों के पिछे अमेरिका का ही हाथ है, ऐसा उन्हें अपने विशेष सुत्रों से पता चला है। वो यों कि इन विस्फोटों के द्वारा वह विश्व जनमत को परमाणु हथियारों का भय दिखाकर ईरान पर हमला करने की अपनी योजना को अमली जामा पहनाना चहाता है। वैसे भी इराक में उसकी जो किरकिरी हुई है उसके बाद ईरान पर हमला करने के लिए उसे किसी ठोस वजह की आवश्यकता थी।

इस पर हमने पुछा कि फिर तो अमेरिका को . कोरिया पर भी हमला करना चाहिए, क्योकिं ईरान पर तो परमाणु हथियार बनाने का संदेह है जबकि . कोरिया ने तो छाती ठोंककर ऐलान कर दिया है कि वह एक परमाणु शक्ति है।

पहले तो उन्होने हमें घूरकर देखा, फिर हेय-दृष्टि के साथ ठसककर बोले, भईये जब अक्ल कम हो तो ऐसी बड़ी चिजों पर उसे इस्तेमाल नही करना चाहिये। यह काम तो हम जैसे बुद्धिजिवियों का है।

इतना सुनकर हम सहम गये तो उन्होनें आगे कहना शुरू किया, भई अमेरिका . कोरिया पर हमला क्यों करेगा। उसे वहाँ से कौन सा तेल मिलना है? जहाँ से तेल मिलना है उस जमीन पर तो उसका अधिकार हो ही चुका है। साउदी अरब को तो उसने पहले ही डालर की चका-चौंध से अंधा किया हुआ है। इराक और अफगानिस्तान उसके कदमों में गिर ही चुके है। रूस में इतना दम बचा नही कि वह मध्य एशिया में दखल दे सके। तो जो एकमात्र रोड़ा बचा वह है ईरान। और उसे ठिकाने लगाने कि तैयारियों का बिगुल बज चुका है।

वैसे तो अति जी किसी भी विषय पर धारा-प्रवाह कई घटों तक अपने विचार प्रकट कर सकते है। लेकिन जब बहुत देर तक वापस अपनी सीट पर नही पहुचें तो अति जी के लिए बौस का बुलावा आ गया और उन्हें अपनी मति को विश्राम देना पड़ा और हमने भी राहत की साँस ली।


क्लोनिगं की गड़बड़

October 11, 2006

कल एक मेल मिला, जिससे जरासीभूल से क्लोनिग के दुष्परिणाम दर्शाए गए है, पेश है कुछ उदहारण्…

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बाकी बाद में…


मोहम्मद अफज़ल की सजा

October 5, 2006

आजकल समाचार पत्रों में मोहम्मद अफजल की काफी चर्चा है, कुछ लोगों के अनुसार चुंकि उसके टरायल में उचित न्याय प्रक्रिया का इस्तेमाल नही किया गया है अतः उसकी फांसी की सजा को माफ कर दिया जाना चाहिए या फिर उसे उम्र कैद में तब्दील कर दिया जाना चाहिए। कुछ लोगों एवं सगंठनो ने इसके लिए राष्टरपति से गुहार भी लगाई है।
परंतु यहाँ जो विचार करने योग्य बात है कि यदि उसे अपना वकील करने की इजाजत दे दी गई होती तो क्या उसका अपराध कम हो जाता? उसके विरुध संसद पर हमला करने की साजिश का आरोप है जो कि एक प्रकार से भारत के विरुध युद्ध के समान ही अपराध है। मै नही जानता कि इस अपराध के लिए सजा-ए-मौत से कम क्या सजा हो सकती है।
कभी-कभी कुछ घटनाओं को देख-सुन करक लगता है कि हम भारतीयों को अपने देश से उतना प्रेम नही है जितने का हम दिखावा करते है। हमारी नजरों में हमारे राष्टर के सम्मान की कोई कीमत नही है। तभी तो कभी एक मंत्री की बेटी के अगवा होने पर हम खुंखार आतंकवादियों को रिहा कर देते है, कभी चरारे-शरीफ में छुपे आतंकवादियों को सुरक्षित बाहर निकलने का रास्ता देते है। और हद तो तब होती है जब एक विमान के अपहरण के पश्चात्त हमारे विदेश मंत्री आतंकवादियों को सस्मान् कंधार छोड़ कर आते है। और दलील दी जाती है कि यह सब कुछ राष्टरहित में किया गया है।
यह एक कड़वी सच्चाई है कि पूरी ताकत एवं प्रयासों के बावजूद हम अपने पड़ोसी को अपने देश के खिलाफ षड़यत्रं करने से रोकने में पूरी तरह नाकाम रहे है। लेकिन क्या हम इतने गये-गुजरे है कि पकड़े हुए आतंकवादियों को कड़ी से कड़ी सजा देकर, उनके मन में खौफ भी पैदा नही कर सकते। अगर हम उन्हें रोक नही सकते तो इतना तो बता ही सकते है कि हमारे खिलाफ षड़यत्रं की सजा है उनकी मौत!
और अभी-अभी ताजा समाचार है कि सरकार ने अफज़ल की सजा को कुछ समय के लिए होल्ड कर दिया है (स्रोत्र : NDTV Website)
http://www.ndtv.com/template/template.asp?id=20407&template=Parliamentattack&callid=0&frmsrch=1&txtsrch=afzal


दशहरा और रामलीला

September 29, 2006

आजकल रामलीला की काफ़ी धूम मची हुई है। अपना भी बहुत मन करता है रामलीला देखने का, दोस्तो के साथ लेकिन एक तो समय का परोब्लम और फ़िर अब साथ जाने के लिए कोई दोस्त भी नही बचा। सब मशरूफ हो गये है दुनियादारी में। पहेले बहुत मजा आता था जब सब दोस्त साथ मिल कर रामलीला देखने जाते थे और बहुत मस्ती करते थे। वो किसी सुंदर लडकी को देखकर शरारत करना, या फ़िर झुले झुलना, एक बार में तो कभी मन भरता ही नही था, कभी कभी घर पर रामलीला देखने का बहाना बना कर नाईट शो देखने जाना, या फ़िर दोस्तो के साथ देर रात तक सडकों पर बेमकसद घूमना। सब कुछ कितना अच्छा था। लेकिन अब तो रामलीला देखने गये हुए ही कितने साल हो गए हैं। लेकिन सच कहें तो लगता है कि अब रामलीलाओं में वह बात नही रही, सब कुछ नकली हो गया है। रामलीलायें भक्तिमय न रहकर राजनितिक मंच हो गई है। अब भी कभी कभी केबल वाले की कृपा से लोकल रामलीला का लाईव प्रसारण देखने को मिल जाता है लेकिन वहाँ रामलीला कम और राजनिति होती ज्यादा दिखाई देती है। मंच पर आसीन सभी लोग अपना राजनीतिक कैरियर परवान चढाने की कोशिश में लगे दिखाई पडते है। इतने सब के बावजूद दशहरे पर रावण फुंकता हुआ देखने अभी भी जाता हुँ। भीड का एक हिस्सा बनने में कभी-कभी ही मजा आता है। कभी हम किसी के कंधों पर चढे थे आज किसी को हम अपने कंधों पर चढायेगें।


गांधी इज बैक

September 26, 2006

एक खुशखबरी! गांधी जयंती के उपलक्षय में स्टार प्लस 1 अक्टूबर को रिचर्ड एटनबरो द्वारा निर्देशित “गांधी” फिल्म दिखा रहा है। लगता है लोग फिर से गांधी की और आकर्षित हो रहे है। पहले “लगे रहो मुन्नाभाई” की “गांधीगिरी”, अब स्टार प्लस पर “गांधी”।