क्या हमारे देश मे लोकतंत्र है या सिर्फ तानाशाही है।

जून 19, 2011

5 जून की रात को दिल्ली के रामलीला मैदान मे जो कुछ हुआ उसे आप सभी जानते है। उसके बारे मैं लगभग सभी चेनलों और बहुत से ब्लोगस पर पक्ष और विपक्ष पर काफी दलीलें आप पढ़ और सुन चुके है। वह रात भारत के लोकतंत्र के माथे पर एक काला धब्बा है ऐसा लगभग सभी लोग मानते है। परंतु उस रात के बाद भी पर्दे के पीछे बहुत सी ऐसी घटनाएँ घाट रही हो जो भारत के लोकतान्त्रिक देश होने पर प्रश्न-चिन्ह लगाती है, उन घटनाओ के बारे मैं अधिक जानने के लिए निम्न लिंक्स पर जाएँ और फिर दूसरे लोगो को भी बताएं।

सरकार ने मीडिया को बाबा रामदेव और अन्ना हज़ारे की कवरेज करने से माना किया है।

बाबा रामदेव को बदनाम करने के लिए 5 दिन मे 1700 करोड़ के विज्ञापन।


अँगुलियोँ की जादुगरी!

फ़रवरी 3, 2011

पहले तो देखिये एक अदभुत विज्ञापन और फिर जानिये इसके बनने की दास्ताँ।

 

 

और ये रही इसके बनने की कहानी।


इनक्रेडिबल इंडिया का नया ऐड, शानदार

सितम्बर 23, 2010

इस ऐड को देखें और गर्व करें, भारत पर और उसके सुंदर नजारों पर।


इस बार नही

दिसम्बर 4, 2008

मुम्बई में हुये ताडंव पर अब तक आपने काफी कुछ देखा और पढ़ा होगा। यहाँ पढ़िये मशहूर गीतकार प्रसून जोशी की प्रतिक्रिया।

 

 

इस बार नहीं

इस बार जब वो छोटी सी बच्ची मेरे पास

अपनी खरोंच ले कर आयेगी

मैं उसे फू-फू कर नही बहलाउंगा

पनपने दूँगा उसकी टीस को।

इस बार नहीं

 

इस  बार जब मैं चेहरों पर दर्द लिखा देखूगां

नही गाउँगा गीत पीड़ा भुला देने वाले

दर्द को रिसने दूँगा, उतरने दूँगा अन्दर गहरे।

इस बार नहीं

   

इस बार मैं ना मरहम लगाउँगा

ना ही उठाउँगा रूई के फाहे

और ना ही कहूँगा की तुम आँखे बंद कर लो, गरदन उधर घुमा लो मैं

दवा लगाता हूँ।

इस बार नहीं

   

इस बार जब उलझने देखूगां, छटपटाहट देखूगां

नही दौडूँगा उलझी डोर लपेटने

उलझने दूँगा जब तक उलझ सके।

इस बार नहीं

   

नही करूँगा फिर से एक नई शुरूआत

नही बनूँगा मिसाल एक कर्मयोगी की

नही आने दूँगा जिदंगी को आसानी से पटरी पर

उतरने दूँगा उसे कीचड़ में, टेढ़े-मेढ़े रास्तों पे

नही सूखने दूँगा दीवारों पर लगा खून

हल्का नही पड़ने दूँगा उसका रंग

इस बार नहीं बनने दूँगा उसे इतना लाचार

की पान की पीक और खून का फर्क ही खत्म हो जाये ।

इस बार नहीं

 

इस बार घावों को देखना है

गौर से

थोड़ा लम्बे वक्त तक

कुछ फैसले

और उसके बाद हौसले

कहीं तो शुरूआत करनी ही होगी

इस बार यही तय किया है।

 

…… प्रसून जोशी

 

 

This time when that little girl comes to me with her bruises,

I will not blow gently at her wound,

nor distract her, I will let her pain grow.

Not this time.

 

This time when I see pain on faces

I will not sing the song that eases pain

I will let the pain seep in, deep.

Not this time.

 

This time I won’t apply any balm

Nor will I ask you to shut your eyes

and turn your head

While I gingerly apply medicine

I will let everyone see the open, naked wounds

Not this time.

 

This time when I see difficulty, uneasiness

I will not run to solve the problems

I will let them become complicated

Not this time.

 

This time the wounds need to be watched

Carefully

For a long time

Some decisions are needed

And then some brave moves to be made

We have to begin somewhere

This time this is what I have resolved

… Prasoon Joshi


मैक्स का नया विज्ञापन

सितम्बर 19, 2008

अभी कुछ दिनों से TV पर मैक्स न्यूयार्क लाइफ इंश्योरेशं का नया ऐड देखने को मिला। आप ने भी जरूर देखा होगा। अगर नही तो देखिये और एक कलात्मक ऐड का लुत्फ उठाईये! कृपया शब्दों पर अवश्य गौर फरमाना।

 


हमारे लिए स्वतंत्रता दिवस का महत्व

अगस्त 22, 2008

कल 15 अगस्त था। सुबह देर से सो कर उठा, करीब 9.30 बजे। इस वजह से प्रधानमत्री का लालकिले की प्राचीर से दिया जाने वाला भाषण भी नही सुन पाया। लेकिन कुछ भी अफसोस नही हुआ। पिछले तकरीबन 5-6 सालों से भाषण न सुन पाने का अफसोस होता भी नही है। बाकी मुख्य बातें तो समाचार चैनलों पर दिन भर बजती रहती है। प्रधानमंत्री ने ये कहा, इस चीज का वायदा किया आदि। हर साल ऐसा होता है भाषण में कुछ बातें, कुछ वायदे, कुछ सौगातें। किसे याद रहता है कि पिछ्ले साल का वायदा पुरा हुआ कि नही। हाँ इस बार सरकारी कर्मचारियों को अच्छा तोहफा मिला है। छठे वेतन आयोग की सिफारिशें लागू होने से! अब अपन तो सरकारी नौकरी में है नही, तो अपने को तो कोई फर्क नही पड़ता। पर हाँ मनीष भाई के लिये जरूर खुशी हुई। मनीष भाई पार्टी उधार रही।

स्वतत्रंता दिवस व रक्षा बन्धन एक साथ होने से लगातार तीन छुट्टियों का तोहफा मिला है मन में खुशी है। लेकिन स्वतत्रंता दिवस का कोई उल्लास नही है। आखिर हो भी कैसे। स्वतत्रंता दिवस मनाने का कोई तरीका भी तो नही मालूम, सिवाय दोस्तो को बधाई SMS भेजने के।

बचपन में तो इस दिन का काफी इतंजार रहता था। करीब हफ्ता भर पहले ही तैयारियाँ शुरु हो जाती थी। पतंगे खरीदी जाती थी, माझां व डोर मंगाई जाती थी और सुबह-सुबह सात बजे से ही छ्त पर डेरा जम जाता था, जो कोई दोपहर 2 बजे तक लगातार चलता था। यूँ तो अपन पतंग उड़ाने में कोई मंझे हुए खिलाड़ी नही थे। लेकिन दोस्तों व भाई-बहनों के साथ काफी मजा आता था। इस बीच न धूप की चिंता होती थी न भूख की। वैसे भगवान भी इस दिन काफी मेहरबान रहता है आसमान लगभग बादलों से भरा रहता है। याद नही पड़ता की कभी ऐसा हुआ हो कि तेज धूप की वजह से पतंग न उड़ा पाये हो। 2-3 घंटे के दोपहर के आराम के बाद शाम को फिर से टोली छत पर चढ़ जाती थी। आसमान में चारो तरफ केवल पतंगे ही दिखती थी। हरी, नीली, पीली, लाल, तीन रंग के तिरंगे। डिजाईन के आधार पर पतंगों के कुछ नाम भी होते थे। अब तो दिमाग पर जोर डालने पर भी याद नही आ रहे। आखिर पतंगे उड़ाना भी तो 10-12 साल पहले छूट चुका है। कभी-कभी लगता है शायद बचपन को कुछ पहले ही कहीं पिछे छोड़ दिया है।

अब तो 15 अगस्त के नाम पर याद रहता है केवल एक छुट्टी का दिन। सुबह देर तक सोना, कुछ दोस्तो को SMS करना या फिर फोन पर बाते करना (और वह भी सिर्फ आफिस या आफिस के काम की)। इसके अलावा तो 15 अगस्त की कोई स्पेशल बात नही होती। इस उत्सव को मनाने का कोई तरीका नही दिखाई पड़ता। वैसे इस बार एक बिहारी दोस्त से बात करने पर पता चला की उनके यहाँ इस दिन जलेबी खाने का रिवाज है। क्यों?  क्योकि जलेबी राष्ट्रीय  मिठाई है। यह बात अपनी जनरल नालेज से तो आज तक बाहर ही थी। इधर दिल्ली में तो ऐसा कोई रिवाज देखने सुनने को नही मिलता।

सोचता हुँ कि क्या हम लोग इस  राष्ट्रीय त्यौहार को मनाने का कोई तरीका नही ईजाद कर सकते (झंड़ा फहराने के अलावा)। और अगर वह तरीका सामुहिक रुप में हो तो कितना अच्छा हो, जैसे होली पर सभी लोग सामुहिक तरीके से मनाते है। ऐसा क्या तरीका हो सकता है अगर किसी के दिमाग में कोई विचार हो तो बतायें।


क्या कोई इन्हें रोक सकता है?

जुलाई 23, 2008

सावन का मौसम आ पहुचाँ है। इस बार इंद्रदेव सावन आने से काफी पहले ही दिल्ली पर दिल खोल कर बरस चुके है। वैसे सावन आने का आभास हमें अपने चारों ओर पेड़-पौधो पर नये पत्ते, नई-नई हरी घास, आसमां मे फैले काले, सफेद, नीले बादल और कई बार सतरंगी इन्द्र्धनुष को देखकर होना चाहिये। लेकिन दिल्ली में सावन आने का पता इनमें से किसी के भी द्वारा नही लगता। बल्कि यहाँ तो सडकों के किनारे काँवडियों के लिये लगने वाले विश्राम स्थलों को देखकर पता चलता है कि सावन का महीना आ चुका है।

उत्तर भारत मे सावन के महीने में गंगाजल द्वारा शिवलिंग का अभिषेक किया जाता है। जिसके लिये एक बांस के दोनो सिरों पर जलपात्र को बांधकर गंगाजल को लाया जाता है, जिसे कावंड़ कहते है। और कावंड़ लाने वाले लोगो को कावंड़िया कहा जाता है। ये लोग पैदल ही हरिद्वार से गंगाजल लाते है और इस यात्रा के दौरान कांवड़ को जमीन पर नही रख सकते। इन्हीं लोगो के विश्राम के लिये ही जगह-जगह कैंप लगाये जाते है। इन कैपों मे लोग फल-मिठाई एवं दूध वगैरह से इनकी सेवा कर पुण्य लाभ कमाने की कोशिश करते है। कही-कही तो महिलाँये इनके पैर दबाकर अथवा मालिश करके भी अपने को भाग्यवान समझती है।

वैसे तो कावंड़ लाने की प्रथा को पवित्र व इस यात्रा के दौरान सहे जाने वाले कष्टों को तपस्या माना जाता है। परंतु पिछले कुछ वर्षो से, कैंपों में मिलने वाली सुविधाओं की वजह से, कावंड़ियों की संख्याँ लाखों मे पहुँच चुकी है। एक सरकारी अनुमान के अनुसार पिछले साल तकरीबन 20 लाख कावंड़िये दिल्ली के रास्ते गुजरे थे। और इस साल इस सख्याँ के बढ़ने का ही अनुमान है। चुनावी साल होने के कारण स्थानीय नेताओं मे इस बार ऐसे कैंप लगाने की विशेष होड़ है। शिव सेना ने तो ऐलान तक कर दिया है कि अगर दिल्ली सरकार ने कावंड़ियों को विशेष सुविधाँये नही प्रदान की तो वह मुस्लिमों के लिए बनने वाले हज विश्राम स्थल को नही बनने देगी। और यह सब कुछ किया जा रहा है चुनाव में हिन्दु वोटों को हासिल करने के लिए।

परंतु अपने इस राजनैतिक फायदे के बीच यह लोग भूल जाते है कि जगह-जगह लगने वाले इन कैंपों की वजह से आम जनता की परेशानियाँ कितनी बढ़ गई है। आधी से ज्यादा सड़क को ये कैंप घेर लेते है, जिसकी वजह से पूरे दो हफ्ते तक दिल्ली की सड़को पर जाम लगा रहता है। कहीं-कहीं तो सड़कों को पूरी तरह से बंद कर दिया जाता है। दिल्ली – मेरठ जैसे व्यस्त हाईवे को भी एक सप्ताह के लिऐ बंद कर दिया जाता है। और यह सब किया जाता है उन शिव भक्तों के लिये जिनमें से 80% से अधिक केवल रास्ते में मिलने वाली सुविधाओं को भोगने के लिऐ ही इस यात्रा पर जाते है। इन झूठे भक्तों के व्यवहार में न तो धर्म का और न ही पवित्रता का कोई स्थान होता है। यात्रा के दौरान इन लोगों द्वारा बीड़ी, सिगरेट, पान, तंबाखु आदि का प्रयोग निर्बाध रूप से जारी रहता है। कहीं-कहीं तो कुछ लोग भोले-बाबा के नाम पर नशा तक करते पाए जाते है। आखिर यह कैसी पूजा है? अनेकों स्थानो पर आम लोगो को इन कावंड़ियों की गुंड़ागर्दी का शिकार होना पड़ता है। हर साल इन कावंड़ियों के गुटों द्वारा लूट्पाट के समाचार सुनने को मिलते है।

समझ मे नही आता की ऐसे पापी, दिशाहीन व चरित्रहीन लोगो के लिए इतने अधिक कैपों का आयोजन क्यों किया जाता है। जबकी इन कैपों मे मिलने वाली सुविधाँओं व मौज-मस्ती के कारण ही इन नकली कावंड़ियों की संख्या साल-दर-साल बढ़ती ही जा रही है।

मेरे विचार में सरकार एवं धार्मिक संगठनों को ऐसे लोगो को हत्तोत्साहित करने के लिऐ निम्न उपाये करने चाहिये।

  1. इन कैपों की संख्या व उनमें मिलने वाली सुविधाओं मे कमी की जाये।
  2. दो कैपों के बीच कम-से-कम आठ से दस किलोमीटर का फासला हो।
  3. इन कैपों में सिगरेट, पान, तंबाखु व गुटखा खाने वाले लोगो को न ठहरने दिया जाए।
  4. कैपों में विभिन्न व्यंजनों की बजाए केवल सात्विक आहार (जैसे फल और दूध) ही दिया जाये।
  5. कैंपों मे दिन-रात बजने वाले कान-फोड़ू संगीत को बंद किया जाये।
  6. थोड़ी-थोड़ी दूर पर छोटे-छोटे कैंपों की जगह बड़े-बड़े मैदानों में विशाल कैंप लगाये जाये, जिससे सड़को पर यातायात में व्यवधान न पड़े।

यदि यह उपायें अपनाये जायें तो झूठे एवं मक्कार कावंड़ियों की संख्या में अवश्य कमी आयेगी तथा आम जनता को भी राहत मिलेगी। इसके साथ ही लोग भी सच्चे कावंड़ियों को हिकारत की नजरों से देखना बंद कर देंगे।