अति की मति

अक्टूबर 14, 2006

आईये आज पको अपने एक मित्र से मिलवायें। वैसे तो वह हमारे साथ काम करते है, लेकिन फिर भी हम उन्हें अपना मित्र कह सकते है। यह बात अलग है कि उनके अनुसार यह हमारा सौभाग्य है कि वह हमारे मित्र है। हमारे इन मित्र का नाम है अति। अरे ना, ना, ना!!! इनके नाम को देखकर इस धोखे मे मत पढना कि यह कोई नौंटकी छाप आदमी है। अपने नाम के अनुरुप इनकी बुद्धि (मति) भी विशाल है ऐसा इनका मानना है। अपने आपको बुद्धिजिवी कहलाने मे इन्हें विशेष गर्व होता है। तभी तो हम जैसे अल्प-मति प्राणियों का यह सौभाग्य है कि वह हमारे मित्र है।

अब हमारे इन बुद्धिजिवी मित्र की विशेषता है कि जब तक किसी महत्वपूर्ण घटना पर यह अपना पक्ष न रख दें तब तक इन्हें चैन नही आता। अब उ. कोरिया परमाणु विस्फोट करे और हमारे अति जी की मति इस विषय पर न चलें ऐसा संभव नही। तो हो गये शुरू कल लचं में अपनी विशेष दिव्य-दृष्टि के साथ।

अब अति जी की मानें तो . कोरिया के परमाणु विस्फोटों पर अमेरिका का हो-हल्ला एक तमाशा है। उनके अनुसार इन विस्फोटों के पिछे अमेरिका का ही हाथ है, ऐसा उन्हें अपने विशेष सुत्रों से पता चला है। वो यों कि इन विस्फोटों के द्वारा वह विश्व जनमत को परमाणु हथियारों का भय दिखाकर ईरान पर हमला करने की अपनी योजना को अमली जामा पहनाना चहाता है। वैसे भी इराक में उसकी जो किरकिरी हुई है उसके बाद ईरान पर हमला करने के लिए उसे किसी ठोस वजह की आवश्यकता थी।

इस पर हमने पुछा कि फिर तो अमेरिका को . कोरिया पर भी हमला करना चाहिए, क्योकिं ईरान पर तो परमाणु हथियार बनाने का संदेह है जबकि . कोरिया ने तो छाती ठोंककर ऐलान कर दिया है कि वह एक परमाणु शक्ति है।

पहले तो उन्होने हमें घूरकर देखा, फिर हेय-दृष्टि के साथ ठसककर बोले, भईये जब अक्ल कम हो तो ऐसी बड़ी चिजों पर उसे इस्तेमाल नही करना चाहिये। यह काम तो हम जैसे बुद्धिजिवियों का है।

इतना सुनकर हम सहम गये तो उन्होनें आगे कहना शुरू किया, भई अमेरिका . कोरिया पर हमला क्यों करेगा। उसे वहाँ से कौन सा तेल मिलना है? जहाँ से तेल मिलना है उस जमीन पर तो उसका अधिकार हो ही चुका है। साउदी अरब को तो उसने पहले ही डालर की चका-चौंध से अंधा किया हुआ है। इराक और अफगानिस्तान उसके कदमों में गिर ही चुके है। रूस में इतना दम बचा नही कि वह मध्य एशिया में दखल दे सके। तो जो एकमात्र रोड़ा बचा वह है ईरान। और उसे ठिकाने लगाने कि तैयारियों का बिगुल बज चुका है।

वैसे तो अति जी किसी भी विषय पर धारा-प्रवाह कई घटों तक अपने विचार प्रकट कर सकते है। लेकिन जब बहुत देर तक वापस अपनी सीट पर नही पहुचें तो अति जी के लिए बौस का बुलावा आ गया और उन्हें अपनी मति को विश्राम देना पड़ा और हमने भी राहत की साँस ली।


क्लोनिगं की गड़बड़

अक्टूबर 11, 2006

कल एक मेल मिला, जिससे जरासीभूल से क्लोनिग के दुष्परिणाम दर्शाए गए है, पेश है कुछ उदहारण्…

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बाकी बाद में…


मोहम्मद अफज़ल की सजा

अक्टूबर 5, 2006

आजकल समाचार पत्रों में मोहम्मद अफजल की काफी चर्चा है, कुछ लोगों के अनुसार चुंकि उसके टरायल में उचित न्याय प्रक्रिया का इस्तेमाल नही किया गया है अतः उसकी फांसी की सजा को माफ कर दिया जाना चाहिए या फिर उसे उम्र कैद में तब्दील कर दिया जाना चाहिए। कुछ लोगों एवं सगंठनो ने इसके लिए राष्टरपति से गुहार भी लगाई है।
परंतु यहाँ जो विचार करने योग्य बात है कि यदि उसे अपना वकील करने की इजाजत दे दी गई होती तो क्या उसका अपराध कम हो जाता? उसके विरुध संसद पर हमला करने की साजिश का आरोप है जो कि एक प्रकार से भारत के विरुध युद्ध के समान ही अपराध है। मै नही जानता कि इस अपराध के लिए सजा-ए-मौत से कम क्या सजा हो सकती है।
कभी-कभी कुछ घटनाओं को देख-सुन करक लगता है कि हम भारतीयों को अपने देश से उतना प्रेम नही है जितने का हम दिखावा करते है। हमारी नजरों में हमारे राष्टर के सम्मान की कोई कीमत नही है। तभी तो कभी एक मंत्री की बेटी के अगवा होने पर हम खुंखार आतंकवादियों को रिहा कर देते है, कभी चरारे-शरीफ में छुपे आतंकवादियों को सुरक्षित बाहर निकलने का रास्ता देते है। और हद तो तब होती है जब एक विमान के अपहरण के पश्चात्त हमारे विदेश मंत्री आतंकवादियों को सस्मान् कंधार छोड़ कर आते है। और दलील दी जाती है कि यह सब कुछ राष्टरहित में किया गया है।
यह एक कड़वी सच्चाई है कि पूरी ताकत एवं प्रयासों के बावजूद हम अपने पड़ोसी को अपने देश के खिलाफ षड़यत्रं करने से रोकने में पूरी तरह नाकाम रहे है। लेकिन क्या हम इतने गये-गुजरे है कि पकड़े हुए आतंकवादियों को कड़ी से कड़ी सजा देकर, उनके मन में खौफ भी पैदा नही कर सकते। अगर हम उन्हें रोक नही सकते तो इतना तो बता ही सकते है कि हमारे खिलाफ षड़यत्रं की सजा है उनकी मौत!
और अभी-अभी ताजा समाचार है कि सरकार ने अफज़ल की सजा को कुछ समय के लिए होल्ड कर दिया है (स्रोत्र : NDTV Website)
http://www.ndtv.com/template/template.asp?id=20407&template=Parliamentattack&callid=0&frmsrch=1&txtsrch=afzal