भारती की गवाही

नवम्बर 29, 2006

भारती यादव को आखिरकार आना ही पड़ा। वैसे भारती के परिवार ने कोशिश तो काफी की उसको गवाही से बचाने के लिए। लेकिन हाय रे किस्मत, पासपोर्ट ने सब गड़बड़ कर दी। चलो देर से ही सही अब भारती की गवाही हो सकेगी। लेकिन देखना होगा कि भारती कोर्ट मे कया बयान देती है। क्या भारती अपने परिवार के खिलाफ जा सकेगी? वैसे अगर वह ऐसा पिछ्ले कई सालों मे नही कर पाई तो संदेह होता है कि वह आज भी ऐसा कर पायेगी। लेकिन यदि भारती ऐसा कर पाती है तो सच की यह एक और जीत होगी।

पिछले कुछ समय से मीड़िया में चर्चित कई केसों के फैसले आए है और काफी त्वरित आये है। चाहे वह प्रियदर्शनी मट्टू केस हो या फिर जेसिका लाल केस की पुनः सुनवाई हो। और ऐसा हो पाया है केवल मीड़िया की सजगता के कारण। मीड़िया ने जिस प्रकार इन केसों पर नजर रखी तथा जनता को इन मुद्दों से जोड़े रखा वह सचमुच काबिले तारिफ है। वैसे और भी आच्छा हो यदि यही मीड़िया रोज दो-तीन घंटे क्रिकेट पर बर्बाद करने की बजाए, जनता को इसी प्रकार सामाजिक मुद्दों पर जागरुक करें तथा उन्हें उनसे जुड़ने मे मदद करें।


यह कैसी सरकार!

नवम्बर 7, 2006

लो महिने भर की टालमटोल के बाद वह स्थिति ही गई जिसका की सभी को अंदेशा था। सुप्रिम कोर्ट ने साफ कर दिया कि दिल्ली में सिलिंग नही रूकेगी। पिछले महीने व्यापारियों के सड़को पर उतरने तथा सीलमपुर में दो लोगों की मौत के बाद लोगों को लगा था कि शायद अब सरकार हरकत में आयेगी और इस समस्या का कोई समाधान लायेगी। लेकिन बार-बार कोर्ट से मोहलत लेने के बावजूद इस सरकार ने कोई ठोस कार्य नही किया। और कल सुप्रिम कोर्ट से कड़ी फटकार के बावजूद भी नही लगता कि इन नेताओं की चमड़ी पर कोई फर्क पढ़ेगा।

अब सुप्रिम कोर्ट की फटकार के बाद इस सरकार का कहना है कि वह इस मामलें में ज्यादा कुछ नही कर सकती और कोर्ट के आदेश का पालन करना उसकी संवैधानिक मजबूरी है। लेकिन अफजल की फाँसी की सज़ा और सांसदों के लाभ के पद के मामले में इस सरकार का विवेक कहाँ था? आखिर वह भी तो सुप्रिम कोर्ट के ही निर्णय थे! उस समय इस सरकार की कोर्ट के निर्णय को मानने की बाध्यता नही थी क्या?

कोर्ट के निर्णय के बाद आज फिर व्यापारी सड़कों पर होगें। उन्हे उम्मीद है कि उनके आदोंलन तथा उग्र प्रदर्शन के बाद सरकार को होश आयेगा। वह 40 लाख लोगों की रोजी-रोटी की चिन्ता के प्रति सचेत होगी और समस्या के हल के लिए कोई पहल करेगी। लेकिन इसकी उम्मीद कम ही है। कल आजतक पर दिखाई एक रपट के अनुसार दिल्ली के नये बने मालों में पैसा ज्यादातर बड़े बिल्ड़रों और नेताऔं का ही लगा हुआ है, ऐसे में उनसे उम्मीद करना कि वे अपना नुकसान करेगें निरि बेवकूफी है। इसके अतिरिक्त अब रिटेल के कारोंबार में रिलांयस, टाटा, भारती और ITC जैसे बड़े मगरमच्छों के उतरने के पश्चात यह सोचना कि यह सरकार छोटी मच्छलियों की रक्षा करेगी अपने को धोखे में रखना है। वैसे भी इन नेताऔं को तो अपना हिस्सा मिल ही चुका होगा। बाकी जायें भाड़ मे उनकी बला से!पूंजिवाद की जय हो। डालर देवता की जय हो।