क्या कोई इन्हें रोक सकता है?

जुलाई 23, 2008

सावन का मौसम आ पहुचाँ है। इस बार इंद्रदेव सावन आने से काफी पहले ही दिल्ली पर दिल खोल कर बरस चुके है। वैसे सावन आने का आभास हमें अपने चारों ओर पेड़-पौधो पर नये पत्ते, नई-नई हरी घास, आसमां मे फैले काले, सफेद, नीले बादल और कई बार सतरंगी इन्द्र्धनुष को देखकर होना चाहिये। लेकिन दिल्ली में सावन आने का पता इनमें से किसी के भी द्वारा नही लगता। बल्कि यहाँ तो सडकों के किनारे काँवडियों के लिये लगने वाले विश्राम स्थलों को देखकर पता चलता है कि सावन का महीना आ चुका है।

उत्तर भारत मे सावन के महीने में गंगाजल द्वारा शिवलिंग का अभिषेक किया जाता है। जिसके लिये एक बांस के दोनो सिरों पर जलपात्र को बांधकर गंगाजल को लाया जाता है, जिसे कावंड़ कहते है। और कावंड़ लाने वाले लोगो को कावंड़िया कहा जाता है। ये लोग पैदल ही हरिद्वार से गंगाजल लाते है और इस यात्रा के दौरान कांवड़ को जमीन पर नही रख सकते। इन्हीं लोगो के विश्राम के लिये ही जगह-जगह कैंप लगाये जाते है। इन कैपों मे लोग फल-मिठाई एवं दूध वगैरह से इनकी सेवा कर पुण्य लाभ कमाने की कोशिश करते है। कही-कही तो महिलाँये इनके पैर दबाकर अथवा मालिश करके भी अपने को भाग्यवान समझती है।

वैसे तो कावंड़ लाने की प्रथा को पवित्र व इस यात्रा के दौरान सहे जाने वाले कष्टों को तपस्या माना जाता है। परंतु पिछले कुछ वर्षो से, कैंपों में मिलने वाली सुविधाओं की वजह से, कावंड़ियों की संख्याँ लाखों मे पहुँच चुकी है। एक सरकारी अनुमान के अनुसार पिछले साल तकरीबन 20 लाख कावंड़िये दिल्ली के रास्ते गुजरे थे। और इस साल इस सख्याँ के बढ़ने का ही अनुमान है। चुनावी साल होने के कारण स्थानीय नेताओं मे इस बार ऐसे कैंप लगाने की विशेष होड़ है। शिव सेना ने तो ऐलान तक कर दिया है कि अगर दिल्ली सरकार ने कावंड़ियों को विशेष सुविधाँये नही प्रदान की तो वह मुस्लिमों के लिए बनने वाले हज विश्राम स्थल को नही बनने देगी। और यह सब कुछ किया जा रहा है चुनाव में हिन्दु वोटों को हासिल करने के लिए।

परंतु अपने इस राजनैतिक फायदे के बीच यह लोग भूल जाते है कि जगह-जगह लगने वाले इन कैंपों की वजह से आम जनता की परेशानियाँ कितनी बढ़ गई है। आधी से ज्यादा सड़क को ये कैंप घेर लेते है, जिसकी वजह से पूरे दो हफ्ते तक दिल्ली की सड़को पर जाम लगा रहता है। कहीं-कहीं तो सड़कों को पूरी तरह से बंद कर दिया जाता है। दिल्ली – मेरठ जैसे व्यस्त हाईवे को भी एक सप्ताह के लिऐ बंद कर दिया जाता है। और यह सब किया जाता है उन शिव भक्तों के लिये जिनमें से 80% से अधिक केवल रास्ते में मिलने वाली सुविधाओं को भोगने के लिऐ ही इस यात्रा पर जाते है। इन झूठे भक्तों के व्यवहार में न तो धर्म का और न ही पवित्रता का कोई स्थान होता है। यात्रा के दौरान इन लोगों द्वारा बीड़ी, सिगरेट, पान, तंबाखु आदि का प्रयोग निर्बाध रूप से जारी रहता है। कहीं-कहीं तो कुछ लोग भोले-बाबा के नाम पर नशा तक करते पाए जाते है। आखिर यह कैसी पूजा है? अनेकों स्थानो पर आम लोगो को इन कावंड़ियों की गुंड़ागर्दी का शिकार होना पड़ता है। हर साल इन कावंड़ियों के गुटों द्वारा लूट्पाट के समाचार सुनने को मिलते है।

समझ मे नही आता की ऐसे पापी, दिशाहीन व चरित्रहीन लोगो के लिए इतने अधिक कैपों का आयोजन क्यों किया जाता है। जबकी इन कैपों मे मिलने वाली सुविधाँओं व मौज-मस्ती के कारण ही इन नकली कावंड़ियों की संख्या साल-दर-साल बढ़ती ही जा रही है।

मेरे विचार में सरकार एवं धार्मिक संगठनों को ऐसे लोगो को हत्तोत्साहित करने के लिऐ निम्न उपाये करने चाहिये।

  1. इन कैपों की संख्या व उनमें मिलने वाली सुविधाओं मे कमी की जाये।
  2. दो कैपों के बीच कम-से-कम आठ से दस किलोमीटर का फासला हो।
  3. इन कैपों में सिगरेट, पान, तंबाखु व गुटखा खाने वाले लोगो को न ठहरने दिया जाए।
  4. कैपों में विभिन्न व्यंजनों की बजाए केवल सात्विक आहार (जैसे फल और दूध) ही दिया जाये।
  5. कैंपों मे दिन-रात बजने वाले कान-फोड़ू संगीत को बंद किया जाये।
  6. थोड़ी-थोड़ी दूर पर छोटे-छोटे कैंपों की जगह बड़े-बड़े मैदानों में विशाल कैंप लगाये जाये, जिससे सड़को पर यातायात में व्यवधान न पड़े।

यदि यह उपायें अपनाये जायें तो झूठे एवं मक्कार कावंड़ियों की संख्या में अवश्य कमी आयेगी तथा आम जनता को भी राहत मिलेगी। इसके साथ ही लोग भी सच्चे कावंड़ियों को हिकारत की नजरों से देखना बंद कर देंगे।

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न्यूज चैनलों का सच!

जुलाई 15, 2008

दो महिने के बाद CBI ने राजेश तलवार को क्लिन चीट दे दी है। दो महिने तक सभी चैनलों की धमाचौकड़ी, दिमागी कसरत व खुद जाँच ऐजेंसी बनने के बाद भी आज तक आरुषि-हेमराज हत्याकाँड का खुलासा नही हुआ है। जमानत पर रिहा होने के बाद भी राजेश तलवार पर शायद अभी भी शक की गुजांईश बाकी है। लेकिन इस सब ड्रामे के बीच जो अच्छी बात लगी, वह है अनगिनत खबरिया चैनलों के बीच मे से एक न्यूज चैनल का निष्पक्ष एवं स्वच्छ रुप में सामने आना। जब सैकड़ों चैनलो के बातचीत के प्रस्ताव पर दुर्रानी दपंती ने कहा कि वे केवल NDTV चैनल से बातचीत करेगें और केवल उसी चैनल के रिपोर्टर को अपने बयान की बाइट देंगे, तो दिल को कुछ सुकुन का एहसास हुआ। लगा कि लोग स्वच्छ एवं सुघड मिडिया को पहचानते है। नही तो इन न्यूज चैनलों को देख कर तो लगने लगा था कि लोगो कि दिलचस्पी अब खबरों में न हो कर केवल भूतप्रेत एवं अपराधियों की कहानियों मे है।

पिछ्ले एक-दो सालों का मेरा स्वयं का अनुभव बताता है कि खबरिया चैनलों की भीड़ मे केवल NDTV ही एकमात्र चैनल है जो खबरों को सनसनी न बनाकर, उनकी तह तक पहुँचने की कोशिश करता है। और साथ ही खबर के हर पक्ष का विश्लेण करने का प्रयास करता है। जिसमें वह कभी सफ़ल होता है और कभी नही भी होता है। लेकिन उसके प्रयासो मे ईमानदारी साफ़ दिखाई देती है। इस बात से काफ़ी राहत मिलती है कि “सबसे तेज” चैनलों की भीड मे एक चैनल तो है जो खबरों को संतुलित एवं निष्पक्ष रुप में दर्शकों तक पहुचाने मे अभी भी यकीन रखता है। केवल NDTV ही ऐसा एकमात्र चैनल है जिस पर तांत्रिको एवं अपराधियों के मेलोड्रामा के लिए कोई जगह नही है।

एक न्यूज चैनल का अपनी तमाम व्यवसायिक मजबूरियों के बावजूद अपने को स्तरीय एवं संतुलित बनाये रखने का प्रयास निश्चय ही प्रशंसनीय है। NDTV को सलाम! आखिर खबर तो वही है जो सच दिखाये।