हमारे लिए स्वतंत्रता दिवस का महत्व

अगस्त 22, 2008

कल 15 अगस्त था। सुबह देर से सो कर उठा, करीब 9.30 बजे। इस वजह से प्रधानमत्री का लालकिले की प्राचीर से दिया जाने वाला भाषण भी नही सुन पाया। लेकिन कुछ भी अफसोस नही हुआ। पिछले तकरीबन 5-6 सालों से भाषण न सुन पाने का अफसोस होता भी नही है। बाकी मुख्य बातें तो समाचार चैनलों पर दिन भर बजती रहती है। प्रधानमंत्री ने ये कहा, इस चीज का वायदा किया आदि। हर साल ऐसा होता है भाषण में कुछ बातें, कुछ वायदे, कुछ सौगातें। किसे याद रहता है कि पिछ्ले साल का वायदा पुरा हुआ कि नही। हाँ इस बार सरकारी कर्मचारियों को अच्छा तोहफा मिला है। छठे वेतन आयोग की सिफारिशें लागू होने से! अब अपन तो सरकारी नौकरी में है नही, तो अपने को तो कोई फर्क नही पड़ता। पर हाँ मनीष भाई के लिये जरूर खुशी हुई। मनीष भाई पार्टी उधार रही।

स्वतत्रंता दिवस व रक्षा बन्धन एक साथ होने से लगातार तीन छुट्टियों का तोहफा मिला है मन में खुशी है। लेकिन स्वतत्रंता दिवस का कोई उल्लास नही है। आखिर हो भी कैसे। स्वतत्रंता दिवस मनाने का कोई तरीका भी तो नही मालूम, सिवाय दोस्तो को बधाई SMS भेजने के।

बचपन में तो इस दिन का काफी इतंजार रहता था। करीब हफ्ता भर पहले ही तैयारियाँ शुरु हो जाती थी। पतंगे खरीदी जाती थी, माझां व डोर मंगाई जाती थी और सुबह-सुबह सात बजे से ही छ्त पर डेरा जम जाता था, जो कोई दोपहर 2 बजे तक लगातार चलता था। यूँ तो अपन पतंग उड़ाने में कोई मंझे हुए खिलाड़ी नही थे। लेकिन दोस्तों व भाई-बहनों के साथ काफी मजा आता था। इस बीच न धूप की चिंता होती थी न भूख की। वैसे भगवान भी इस दिन काफी मेहरबान रहता है आसमान लगभग बादलों से भरा रहता है। याद नही पड़ता की कभी ऐसा हुआ हो कि तेज धूप की वजह से पतंग न उड़ा पाये हो। 2-3 घंटे के दोपहर के आराम के बाद शाम को फिर से टोली छत पर चढ़ जाती थी। आसमान में चारो तरफ केवल पतंगे ही दिखती थी। हरी, नीली, पीली, लाल, तीन रंग के तिरंगे। डिजाईन के आधार पर पतंगों के कुछ नाम भी होते थे। अब तो दिमाग पर जोर डालने पर भी याद नही आ रहे। आखिर पतंगे उड़ाना भी तो 10-12 साल पहले छूट चुका है। कभी-कभी लगता है शायद बचपन को कुछ पहले ही कहीं पिछे छोड़ दिया है।

अब तो 15 अगस्त के नाम पर याद रहता है केवल एक छुट्टी का दिन। सुबह देर तक सोना, कुछ दोस्तो को SMS करना या फिर फोन पर बाते करना (और वह भी सिर्फ आफिस या आफिस के काम की)। इसके अलावा तो 15 अगस्त की कोई स्पेशल बात नही होती। इस उत्सव को मनाने का कोई तरीका नही दिखाई पड़ता। वैसे इस बार एक बिहारी दोस्त से बात करने पर पता चला की उनके यहाँ इस दिन जलेबी खाने का रिवाज है। क्यों?  क्योकि जलेबी राष्ट्रीय  मिठाई है। यह बात अपनी जनरल नालेज से तो आज तक बाहर ही थी। इधर दिल्ली में तो ऐसा कोई रिवाज देखने सुनने को नही मिलता।

सोचता हुँ कि क्या हम लोग इस  राष्ट्रीय त्यौहार को मनाने का कोई तरीका नही ईजाद कर सकते (झंड़ा फहराने के अलावा)। और अगर वह तरीका सामुहिक रुप में हो तो कितना अच्छा हो, जैसे होली पर सभी लोग सामुहिक तरीके से मनाते है। ऐसा क्या तरीका हो सकता है अगर किसी के दिमाग में कोई विचार हो तो बतायें।